सफर(journey of life)
सफर ज़िन्दगी का सफर, है ये कैसा सफर, कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं! शुरू हुआ ज़िन्दगी का सफर, आया बचपन बिना किसी चिंता के, बेपरवाह, खेलते कूदते माँ बाप की छत्रछाया मे, भाई बहनो के प्यार मे, कब बीत गया बचपन, कब बीत गया बचपन! आई जवानी, लेकर आई नई उमंगे, नया ज़ोश,नये हौसले, कुछ कर गुजरने की चाहतो के साथ, मिला नया घर, नये लोग, और मिली बहुत सी ज़िम्मेदारियां, फिर से आई नयी रौशनी जीवन मे, लौटा फिर से बचपन , छोटे बच्चों की किलकारियों मे, लेकिन अब पलट चुका था पासा, अब थे तुम माँ बाप और तुम पर थी ज़िम्मेदारयां, एक एक तिनका ज़ोड बनाया घोंसला, आई कितनी ही आंधीया, आये कितने ही तूफ़ान पर आंच न आने दी अपने आशियाने पर, इसी भाग दौड़ मे, कब बीत गयी जवानी, कब बीत गयी जवानी! और अब आया बुढ़ापा, बडे हुए बच्चे, बदला वक्त, बदलते हुए वक्त के साथ देखा बदलते हुए रिश्तों को, देखा बदलते हुए लोगो के नज़रिये को, देखा अपनों को होता हुए पराये, देखा अपने शरीर को भी होता हुए पराये, लगने लगी तरह तरह की बीमारियां, और बढ़ने लगा डॉक्टरो का साथ, फिर से ज़ुटाया ज़ोश, उठाया पेन और शुरू किया पढ़ना और पढ़ाना, शुरू किया पूरा कर...