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TEA

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 चाय की चुसकियो सी सुबह से शाम होती है,  जिदंगी यूँ ही तमाम होती है।  घूम रहा है समय का पहिया कुछ इस तरह,  बढ़ रही है उम्र, पर घट रहा है फासला जिदंगी और मौत का।  रोज  एक नई सुबह, एक नई चुनौती देती ये  जिंदगी,  मौसम सी रंग बदलती ये जिंदगी।  कभी लगती  गरमी की चुभती धूप सी,  कभी लगती सरदी की बरफीली ठंडी हवा सी कभी लगती सावन के फूलों सी रंगीन,  कभी लगती पतझड़ के सूखे पत्तों सी बेरंग कभी लगती बारिश की सौधी खुशबू सी,  हर पल रंग बदलती ये जिंदगी।  अंत में लगाया हिसाब, तो जाना ना कुछ खोया, ना कुछ पाया सब कुछ, सब रिश्ते नाते, धन दौलत  इस धरा की है और इस धरा पर ही रह जानी है। खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाना है।  कर अच्छे कर्म, ले भगवान् का नाम  छोड़ दे दुनिया की मोह माया,गर जीतनी  है जिदंगी की जंग। 

सुकून(peace)

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सुकून ऐ सुकून तू कहाँ मिलता है, कया कोई तेरा ठिकाना है।  ढूँढा तुझे हर जगह, पर पता नहीं तू कहाँ मिलता है।  ढूँढा तुझे ऊचे पहाडो़ में, और बहती नदियों में।  ढूँढा तुझे समतल राहों में, और झरझर गिरते झरनो में।  ढूँढा तुझे उगते सूरज की किरणों में, और चाद की शीतलता में।  ढूँढा तुझे घने वृक्षों की छाव में, और सुऺदर फूलों की खुशबू में।  ढूँढा तुझे पंछियों की चहचहाट में, और मासूम पशुओं के प्यार में।  पर पता नहीं तू कहाँ मिलता है, कया कोई तेरा ठिकाना है।  ढूँढा तुझे मंदिरों में ,और मस्जिदों में।  ढूँढा तुझे मोटी मोटी किताबों में, और टीवी चैनलों में।  ढूँढा तुझे अपने मोबाइल में, और यू ट्यूब चैनलों में।  पर पता नहीं तू कहाँ मिलता है, कया कोई तेरा ठिकाना है।  पूछा सब लोगों से,पूछा साधु संतों से।  पर वो तो तुझे ही ढूंढ रहे थे, तेरा पता ही पूछ रहे थे।  ॳत में जाना, सुकून तो कहीं बाहर नहीं है, ये तो अपने अंदर ही है।  ये तो एक अहसास है, जिसको ढूँढते है सब बाहर।  जो मिला, उसी में कर संतोष,  आज की सोच, कल की न सोच जो बीत ...

वाणी

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 वाणी  वाणी है,मुख से निकले हुए कुछ शब्द जो मीठी भी  होते है, और कडवे भी होते है।  शब्द तीर भी है, तलवार भी है कर देते हैं रिश्ते तार तार, कर देते हैं आत्मा छलनी बार बार।  शब्द घाव भी है, शब्द मरहम भी है।  शब्द देते ठऺडे पानी सी शीतलता भी, लगते फूलों के झरने से।  शब्द करेले से कडवे भी, और चीनी से मीठे भी।  रिश्तो में घोलते कडवाहट भी और रिश्तो मे घोलते मिठास भी।  जैसे होते नहीं वापस कमान से निकले हुए तीर वैसे होते नहीं वापस मुख से निकले हुए शब्द।  इस लिए कहते हैं, बोलने से पहले दस बार सोचो। अच्छा सोचो, अच्छा बोलो।

घर (home)

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 घर ईट और गारे से बनते हैं मकान,  रहता है जिसमें हर सुख सुविधा का सामान।  पऺरतु मकान बनता है घर, परिवार से,  परिवार में रहने वालो के प्यार से,  आपस में सदभाव से, सदव्यवहार से,  जहाँ होता है माँ का दुलार, पापा की फटकार,  बच्चों की नादानियां, दादा दादी की पुचकार।  होती है कभी कभी तू तू मै मै और तकरार,  खडी हो जाती है गलतफहमियो की दीवार।  देर नही लगती बनने मे घर को ईट, गारे का मकान, रह जाता है वहाँ सिर्फ साजोसामान, खो जाता है कहीं, रात दिन का सुकून और चैन। घर को घर बनाने के लिए जरूरी है त्याग, विशवास, सदभाव, और आपस में प्यार।

अजनबी

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 अजनबी अजनबी से है रिश्ते सारे, इन रिश्तों की भीड़ में।  कहने को है सारे अपने, पर है सारे अजनबी  ।  कुछ है खून के रिश्ते, कुछ है अपने पन के रिश्ते।  कुछ है मतलब के रिश्ते, कुछ है फर्ज के रिश्ते।  कुछ है इऺसानियत के रिश्ते, कुछ है जरूरत के रिश्ते।  कहने को सारे अपने ,पर है सारे अजनबी  ।  आता है बच्चा जब धरती पर, न जाने बनते हैं कितने ही अनगिनत रिश्ते।  दादा दादी का रिश्ता, नाना नानी का रिश्ता।  माँ बाप का रिश्ता, भाई बहन का रिश्ता।  मौसा मौसी का रिश्ता, चाचा चाची का रिश्ता।  न जाने बनते हैं कितने ही अनगिनत रिश्ते।  मिलता है ढेर सारा प्यार और दुलार इन अनगिनत रिश्तो से।  पंरतु पैसा, सवार्थ, और शायद समय का चक्र बना देता है इन प्यार भरे रिश्तो को अजनबी।  कहने को है सारे अपने, पर है सारे अजनबी।  एक ही है रिश्ता  सच्चा जो होता नहीं कभी अजनबी, वो है आत्मा से परमात्मा का रिश्ता, ईश्वर से प्यार का रिश्ता,  जो पार लगाता है इस जीवन की नैया को, जन्म से मृत्यु तक इन अजनबी रिश्तों की भीड़ में।

नई खुशी

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  हुई उस ईश्वर की ऐसी ईनायत, की घर  आई मेरे एक नन्ही परी,  नाम है जिसका ईनायत।  लेकर आई अपने साथ नई खुशियाँ, नई उम्मीदे, नई उमगे।  करती हू लख लख शुकराना उस ईश्वर का, जिसने भर दी झोली खाली।  आई है लेकर माता का रुप, नाम है जिसका ईनायत ।  6/4/2023 बडी माँ इन्दू

अहसास(feelings)

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  अहसास शायद न रहेगे जिस दिन, होगा अहसास उस दिन।  तिल तिल कर बनाया घोसला, उस घोसले के होने का होगा अहसास किस दिन।  पाई पाई जोड़ चलाई गृहस्ती, उस गृहस्ती के होने का होगा अहसास किस दिन।  कमर तोड़ की मेहनत, देखने को एक झलक खुशी की, उस खुशी के होने का होगा अहसास किस दिन,  शायद न रहेगे जिस दिन, होगा अहसास उस दिन।  भरसक किए पृयास जोडने को एक एक रिश्ते के तार, उस रिश्ते के होने का होगा अहसास किस दिन।  अपनी इच्छाओ, उम्मीदों को छोड़ लगाई तुमसे उम्मीद, उन उम्मीदों के होने का होगा अहसास किस दिन।  शायद न रहेगे जिस दिन, होगा अहसास उस दिन।  होती है गलती हर इंसान से, ढूंढ लेता है गलती वो तो भगवान मे, उस गलती को बार बार गलती कहने का होगा अहसास किस दिन।  गर न हुआ अहसास, तो होगा पछतावा उस दिन, न रहेगे शायद जिस दिन।