घर (home)
घर ईट और गारे से बनते हैं मकान, रहता है जिसमें हर सुख सुविधा का सामान। पऺरतु मकान बनता है घर, परिवार से, परिवार में रहने वालो के प्यार से, आपस में सदभाव से, सदव्यवहार से, जहाँ होता है माँ का दुलार, पापा की फटकार, बच्चों की नादानियां, दादा दादी की पुचकार। होती है कभी कभी तू तू मै मै और तकरार, खडी हो जाती है गलतफहमियो की दीवार। देर नही लगती बनने मे घर को ईट, गारे का मकान, रह जाता है वहाँ सिर्फ साजोसामान, खो जाता है कहीं, रात दिन का सुकून और चैन। घर को घर बनाने के लिए जरूरी है त्याग, विशवास, सदभाव, और आपस में प्यार।