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घर (home)

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 घर ईट और गारे से बनते हैं मकान,  रहता है जिसमें हर सुख सुविधा का सामान।  पऺरतु मकान बनता है घर, परिवार से,  परिवार में रहने वालो के प्यार से,  आपस में सदभाव से, सदव्यवहार से,  जहाँ होता है माँ का दुलार, पापा की फटकार,  बच्चों की नादानियां, दादा दादी की पुचकार।  होती है कभी कभी तू तू मै मै और तकरार,  खडी हो जाती है गलतफहमियो की दीवार।  देर नही लगती बनने मे घर को ईट, गारे का मकान, रह जाता है वहाँ सिर्फ साजोसामान, खो जाता है कहीं, रात दिन का सुकून और चैन। घर को घर बनाने के लिए जरूरी है त्याग, विशवास, सदभाव, और आपस में प्यार।

अजनबी

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 अजनबी अजनबी से है रिश्ते सारे, इन रिश्तों की भीड़ में।  कहने को है सारे अपने, पर है सारे अजनबी  ।  कुछ है खून के रिश्ते, कुछ है अपने पन के रिश्ते।  कुछ है मतलब के रिश्ते, कुछ है फर्ज के रिश्ते।  कुछ है इऺसानियत के रिश्ते, कुछ है जरूरत के रिश्ते।  कहने को सारे अपने ,पर है सारे अजनबी  ।  आता है बच्चा जब धरती पर, न जाने बनते हैं कितने ही अनगिनत रिश्ते।  दादा दादी का रिश्ता, नाना नानी का रिश्ता।  माँ बाप का रिश्ता, भाई बहन का रिश्ता।  मौसा मौसी का रिश्ता, चाचा चाची का रिश्ता।  न जाने बनते हैं कितने ही अनगिनत रिश्ते।  मिलता है ढेर सारा प्यार और दुलार इन अनगिनत रिश्तो से।  पंरतु पैसा, सवार्थ, और शायद समय का चक्र बना देता है इन प्यार भरे रिश्तो को अजनबी।  कहने को है सारे अपने, पर है सारे अजनबी।  एक ही है रिश्ता  सच्चा जो होता नहीं कभी अजनबी, वो है आत्मा से परमात्मा का रिश्ता, ईश्वर से प्यार का रिश्ता,  जो पार लगाता है इस जीवन की नैया को, जन्म से मृत्यु तक इन अजनबी रिश्तों की भीड़ में।