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समय का चक्र

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 समय का चक्र  दिन निकलता है रात होती है ज़िंदगी यूँ ही तमाम होती है पल पल कर उम्र यूँ ही घटती जाती है  कभी ख़ुशी के दो पल, कभी ग़म के दो पल धूप आैर छॉव की तरह  ज़िंदगी यूँ ही तमाम होती है कभी बच्चों की समस्या  कभी पैसों की समस्या  कभी रिश्तों की उलझने कभी ज़मीन जायदाद के झगड़े इन्हीं तरह तरह की उधेड़बुनों मे  ज़िंदगी यूँ ही तमाम होती है। जाना है सबको एक दिन इस दुनिया से उलझे उलझे से ,इन उधेड़बुनों मे उलझे हुए ही चले जाएँगे इस दुनिया से  तब याद करेगी दुनिया, और कहेगी आ गया था वक़्त इनका  नहीं रुकता समय किसी के वास्ते क्योंकि ज़िंदगी सभी की यूँ ही तमाम होती है। ज़रूरत है इस जाते हुए हर पल को ख़ुशी से जीने की छोटी छोटी बातों मैं ख़ुशियाँ ढूँढने की और लोगों मे बाटने की ज़िंदादिली से जीने की क्योंकि ज़िंदगी यूँ ही तमाम होती है।

Adhocism

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                                   बेचारा Adhoc बेचारा Adhoc, बेचारा Adhocकहते है उसको सब बेचारा Adhoc! Adhoc means तदर्थ जिसका होता नहीं कोई अर्थ  हर चार महीने बाद अटक जाती है उसकी साँस हर समय रहती है उसको joining की अास, मिले कोई भी पेपर या कितने ही lecture पढ़ता नहीं उसे कोई फ़र्क़  क्योंकि कहते है उसको सब बेचारा Adhoc,बेचारा Adhoc! ताउम् भागता रहता है सब के पीछे होता है गुटबाज़ी का शिकार, अाती है गरमी की छुट्टी ,लोग सोते हैं सुकून की नींद पंरतु उसकी तो उड़ जाती है रात और दिन की नींद कब मिलेगी मेरी summer salary ,कब मिलेगी मेरी summer salary! Students भी करते है उससे भेदभाव क्योंकि वो है बेचारा Adhoc, बेचारा Adhoc! जीता है डर के साये मैं , हमेशा इस आशा मे , कभी तो आएगा उसका भी समय और वो भी निकलेगा इस मकड़जाल से बाहर क्योंकि कहते है उसको सब बेचारा Adhoc ,बेचारा Adhoc!