समय का चक्र
समय का चक्र दिन निकलता है रात होती है ज़िंदगी यूँ ही तमाम होती है पल पल कर उम्र यूँ ही घटती जाती है कभी ख़ुशी के दो पल, कभी ग़म के दो पल धूप आैर छॉव की तरह ज़िंदगी यूँ ही तमाम होती है कभी बच्चों की समस्या कभी पैसों की समस्या कभी रिश्तों की उलझने कभी ज़मीन जायदाद के झगड़े इन्हीं तरह तरह की उधेड़बुनों मे ज़िंदगी यूँ ही तमाम होती है। जाना है सबको एक दिन इस दुनिया से उलझे उलझे से ,इन उधेड़बुनों मे उलझे हुए ही चले जाएँगे इस दुनिया से तब याद करेगी दुनिया, और कहेगी आ गया था वक़्त इनका नहीं रुकता समय किसी के वास्ते क्योंकि ज़िंदगी सभी की यूँ ही तमाम होती है। ज़रूरत है इस जाते हुए हर पल को ख़ुशी से जीने की छोटी छोटी बातों मैं ख़ुशियाँ ढूँढने की और लोगों मे बाटने की ज़िंदादिली से जीने की क्योंकि ज़िंदगी यूँ ही तमाम होती है।